पूर्वोत्तर यात्रा कि भूमिका ……

पता नहीं क्यों पूर्वोत्तर राज्यों कि यात्रा मेरे लिए हमेशा से ही रोमांचकारी व उत्सुकतापूर्ण रही हैं; शायद एक पहाड़ी को दूसरे पहाड़ियों से आत्मिक आकर्षण ज्यादा रहता हो ? पूर्वोत्तर के लोग, पहाड़ मेरे लिए कभी भी अनजान नहीं रहे, यहाँ आके मुझे घर जैंसा आत्मिक सुख मिलता रहा है | असम, अरुणाचल कि यात्रायें तो मैंने चार साल लगातार कि; यात्रायें क्या बस ये समझिये कि चार साल इन दो राज्यों के बीच ही डोलता रहा; लेकिन इन चार सालों के दौरान कई बार चाहने के बावजदू भी मणिपुर न जा सका | खैर भाग्य से ज्यादा आपको कुछ नहीं मिलता है और घुमक्कड़ी तो भाग्य से ही मिलती है यही सोचकर मैं अपने आपको संतुष्ट कर लेता था, लेकिन यदि आपकी इच्छाएं प्रबल हो तो भाग्य भी आपको रास्ता स्वयं देता है और घुमक्कड़ी के मामले में मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूँ, मेरी जो मित्र-मण्डली, सगे-संबंधियों कि टोली है उनकी जलन को घुमक्कड़ी के मामले में खुद को भाग्यशाली होने का प्रमाण भी मानता हूँ | लेकिन यहाँ में एक बात जरूर कहूँगा; भाग्य उनका साथ नही देता है जो अपनी इच्छाओं को सुबह उठते ही अपने चेहरे को धोते समय रात दिखे  सपनों के साथ धो डालते हैं, बल्कि भाग्य उनको रास्ता देता है जो अपने सपनों, इच्छाओं को हर पल जीते हैं | घुमक्कड़ होना कोई आसान काम नही इसके लिए आपके अन्दर कुछ त्याग करने कि क्षमता होनी चाहिए, केवल पैंसों से आप घुमक्कड़ी का आनंद नही ले पाओगे, पैंसों से आप केवल किसी जगह घूमके आ सकते हो एक सैलानी कि तरह लेकिन आप वहां कि आन्तरिक खूबसूरती व सुख का अनुभव तब तक नही ले पाओगे जब तक आपके अन्दर घुमक्कड़ी के गुण न हो, घुमक्कड़ और सैलानी में कुछ अंतर होते है जिस पर किसी और दिन चर्चा कि जा सकती है | यहाँ केवल पूर्वोत्तर यात्रा की ही चर्चा करता हूँ |

2014 में पूर्वोत्तर से मेरे चार वर्ष के प्रवास के बाद में दिल्ली लौटकर अपनी व्यावसायिक गतिविधियों में डूब चूका था, लेकिन पूर्वोत्तर मुझे अपनी और आकर्षित करता रहा, पूर्वोत्तर जाने का कोई भी मौका मैं अपने हाथ से जाने नही देता हूँ, किसी न किसी बहाने से पूर्वोत्तर कि यात्रा कर ही लेता हूँ और जिसके लिए मुझे भाग्य का पूरा साथ मिलता रहा, पूर्वोत्तर से वापस आने के बाद मुझे एक स्थानीय चित्रकार श्री हेमन्त साहू द्वारा गुवाहटी में एक सामूहिक चित्र प्रदर्शनी में प्रतिभाग करने का अवसर मिला जिसके लिए में वहाँ 7 दिनों तक रहा, वापस दिल्ली आके में अपनी निजी जिंदगी की भागदौड़ में फिर से व्यस्त हो गया | 2015 में एक बार फिर मुझे सामूहिक चित्र प्रदर्शनी के लिए निमंत्रण मिला और मेरा जाना लगभग तय था पर नयी जगह नौकरी के चलते मेरे चित्र तो वहां पहुंचे लेकिन में न पहुँच सका जिसका मुझे आजतक मलाल है |

खैर भाग्य अपना काम करता है और हम अपना, लेकिन घुमक्कड़ी का कीड़ा मुझे बार-बार काटे जा रहा था, दिल्ली में नौकरी से, भीड़ से, यहाँ कि पौन–पौन और स्वार्थों व राजनीतिक संबंधों से मेरा मन उब गया था, कभी-कभी यहाँ खुद को महसूस करना मुश्किल हो रहा था और इस उबासी का विष्फोठ मेरा नौकरी छोड़ने के निर्णय के साथ हुआ | भाग्य मुझे फिर से नया रास्ता दिखा रहा था, लेकिन तब पूर्वोत्तर यात्रा का मेरे मन में कोई विचार नही था, नौकरी छोड़ने के तुरंत बाद मेरी 10 नवम्बर से तुंगनाथ यात्रा कि योजना थी लेकिन में वो यात्रा पूर्ण न कर सका क्योंकि यात्रा शुरू करने से ठीक दो दिन पहले 8 नवम्बर कि रात को देश के प्रधानमंत्री जी ने हज़ार व पांच सौ के नोट अमान्य होने कि घोषणा कर दी थी और मेरी जेब में भी यात्रा के दौरान खर्चे के लिए वही अभागे 1000 व 500 के नोट थे | मै फिर भी देहरादून तक तय कार्यक्रम के अनुसार गया लेकिन सच पूछिए तो मेरी आगे जाने कि हिम्मत न हुई सो वहीँ अड्डा जमा लिया, मेरे आधे से ज्यादा रिश्तेदार वहीँ हैं तो मुझे कोई दिक्कत भी नहीं हुई | नोटबंदी से देश को इसके क्या फायदे-नुकसान हुए मुझे ज्यादा पता नहीं लेकिन उस दौरान व्यक्तिगत रूप से मुझे दो फायदे हुए एक ये कि इसकी वजह से में काफी समय अपने परिवार और रिश्तेदारों को दे पाया, दूसरा फायदा ये कि उन दिनों किसी के घर भी खाली हाथ जाना आसान हो गया था, जिसके लिए मोदी जी का धन्यवाद |

लगभग दो सप्ताह देहरादून में काटने के बाद मैं वापस दिल्ली आ गया क्योंकि हमारी कुंवारों कि टीम से हमारे एक और साथी कन्हैया झा जी का विकेट गिर चुका था और 27 नवम्बर 2016 को दिल्ली में रिसेप्शन था फिर 30 नवम्बर को मुझे एक फोटो शूट के लिए ट्रेन से रानीखेत जाना था | 28 कि सुबह मुझे माननीय अमीरचंद जी का कॉल आया और समय निकालके मिलने आने को कहा, उनसे शाम को मिलने का तय हुआ | शाम को उनको खोजते–खोजते मनोज तिवारी जी के घर पहुँच गया, जहाँ पहले से चार-पांच लोग किसी चर्चा में डूबे हुए थे, पहले 10 मिनट तो उनकी बातें मेरे सर के ऊपर से गुजर गयी लेकिन फिर समझ गया कि किसी बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम कि रूप-रेखा तैयार हो रही है, जिसके लिए समय बहुत कम था, अमीरचन्द जी ने मुझे पूछा कुछ समझे कि क्यों बुलाया, मै भी समझ ही चूका था इसलिए हाँ बोल दिया, हमे 1-2 दिन के अन्दर बनारस जाने का आग्रह किया गया, लेकिन 5-6 तारीख में बनारस जा पाने कि समर्थता जताकर पहले से तय कार्यक्रम के लिए में रानीखेत चला गया | रानीखेत में 2 दिसम्बर कि सुबह तक मेरा फोटोशूट का काम पूरा होने के बाद 3 कि सुबह तक दिल्ली पहुँचने की योजना थी और 5 को बनारस जाने की लेकिन मेरे भाग्य ने तो कुछ और ही तय कर लिया था | 2 दिसम्बर कि सुबह मेरा एक मणिपुरी मित्र मेरे पीछे-पीछे रानीखेत आ पहुंचा, मैंने तो मजाक-मजाक में उसे उत्तराखंड आने का न्योता दिया था वो सच में ही आ पहुंचा, खैर अतिथि देवो भवः कि संस्कृति भी तो अपनी ही है और कौन सा हम किसी वचन से बंधे थे जो काम निपटाके सीधे दिल्ली चले जाते सो मित्र के साथ निकल पड़े नयी डगर पर…… इस यात्रा कि चर्चा अलग से करूँगा क्योंकि यहाँ पूर्वोत्तर यात्रा कि भूमिका लिख रहा हूँ | खैर, उत्तराखंड में भटकने के बाद में 9 दिसम्बर कि सुबह दिल्ली आ टपका और 10 दिसम्बर की रात को बनारस के लिए निकल पड़ा, उन दिनों पूरा उत्तर भारत कड़ाके कि ठण्ड झेल रहा था, ट्रेन-फ्लाइट सब देर से चल रहे थे इसलिए मैंने बस से जाना तय किया, बस ने भी अगले दिन 4 घंटे देर से ही हमे बनारस छोडा |

अगले 15-20 दिन बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय हमारा नया ठिकाना था, बस फिर क्या था बनारस पहुंचकर जुट गए अनोखे कार्यक्रम कि तैयारियों में जिसका नाम था राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव, मेरे पूर्व परिचित भास्कर दा वहां पहले से ही मौजूद थे, 25 दिसम्बर तक इस कार्यक्रम के अलावा हमारे पास और कोई विषय नही था, 25 को कार्यक्रम समाप्त होने के साथ ही बीएचयू के परिसर से कार्यक्रम कि खुमारी उतरने लगी तो जो लोग बीएचयू परिसर में 10-15 दिनों से डटे थे उनमे कार्यक्रम कि समाप्ति के साथ ही घर जाने कि होड़ लगी थी, मुझे और भास्कर दा को कुछ काम निपटाके के दिल्ली वापस जाना था इसलिए हम दोनों ही वहां रह गए थे |

भास्कर दा से मेरा पुराना घनिष्ठ परिचय है, वो खुद पूर्वोत्तर के हैं और असम के जयसागर में उनका घर है, उत्सुकता वश मैने उनसे अपनी पूर्वोत्तर यात्रा कि बात कह दी और अपना ध्येय भी उनको बता दिया, फरवरी मास में मेरा पूर्वोत्तर के असम राज्य तक जाने कि योजना थी; 4 फरवरी को लखनऊ से गुवाहाटी का टिकट भी करा लिया था, 11 फरवरी को मेरे एक मित्र का विवाह था जिसमे मुझे जाना था | मेरा असम यात्रा का ध्येय जानकर उन्होंने मुझे मणिपुर जाने का न्योता दे डाला, मणिपुर जाने का मन तो मेरा कब से था लेकिन कुछ व्यस्तताओं के कारण दुविधा में था, फिर जल्दी ही दुविधाओं को किनारे करते हुए मैंने मणिपुर जाने कि हामी भर दी, सोचा शायद भाग्य भी मुझे मणिपुर जाने हेतु कहाँ से कहाँ घुमा रहा है, वह खुद ही मेरी मणिपुर यात्रा कि भूमिका तैयार कर रहा था, वहां किसी परिचित का विवाह होने वाला था, ऐसे में मै कैंसे वहाँ जाने का निमंत्रण ठुकरा सकता था, वो कहते हैं कि घुमक्कड़ी कि लिए पैंसे कि जरूरत नही होती जरुरत होती है तो अच्छी किस्मत और दृढ इच्छा शक्ति कि, मुझे मणिपुर जाने का विकल्प मिल गया था और मेरी मणिपुर यात्रा के संयोजक व प्रायोजक भास्कर दा ही थे | उन्होंने भी तुरंत 5 फरवरी का मेरा दिल्ली से सीधे इम्फाल का टिकट बुक कर दिया, अब बस मुझे इंतज़ार था तो 5 फरवरी का ………… |

पिछले कुछ वर्षों से लेखन बंद था इसलिए ब्लॉग में केवल यात्रा के दौरान लिए गए कुछ ही चित्र होंगे हैं, लेकिन अब धीरे-धीरे अपने यात्रा संस्मरणों को लिख रहा हूँ, जल्दी ही आपको यहाँ पढने को मिलेंगे, लेकिन यात्राओं के दौरान मेरे द्वारा लिए गए चित्रों को आप मेरी फेसबुक प्रोफाइल परिव्राजक नीरज या फिर आप मेरे फेसबुक पेज परिव्राजक फोटोग्राफी पर भी देख सकते हैं |